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पूर्व डीजीपी अभयानंद के तीखे सवाल से कटघरे में बिहार सरकार

Published on : May 28, 2021, 10:26 AM
By : Beuro
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HIGHLIGHTS

  • कोरोना संकट के दौरान सरकार के स्तर पर किए गए इंतजामों पर उठाया सवाल
  • पूर्व डीजीपी ने सीधे तौर पर बिहार सरकार और उनकी व्यवस्थाओं पर उठाया सवाल

पटना: बिहार में सुपर थर्टी की शुरूआत करने वाले चर्चित आईपीएस अधिकारी रहे पूर्व डीजीपी अभयानंद ने कोरोना संकट में सरकार के द्वारा किए जाने वाले इंतजामों पर बड़ा सवाल कर दिया है। 

अभयानंद ने एक सोशल साइट पर अपने पोस्ट के जरिए सरकार के मंत्रियों, ब्यूरोक्रेसी को संभाल रहे IAS अधिकारियों और जनता के बीच इनकी नीतियों को धरातल पर लाने वाले विभाग के अफसरों औरकर्मचारियों को सीधे तौर पर कटघरे में खड़ा करते पूछा है कि आखिर कोरोना से जुड़े व्यापक सवाल का उत्तर कौन देगा।

पूर्व DGP ने सीधे तौर पर बिहार सरकार और उनकी व्यवस्थाओं पर सवाल उठाया है। स्पष्ट रूप से कहा कि सरकार में नीतिगत निर्णय लेने वालों को समाज और मीडिया के सामने आना चाहिए। उनके सवालों का जवाब देना चाहिए। 

अभ्यानंद के इस पोस्ट के बाद राज्य में हड़कंप मचा हुआ है। क्योंकि, इनके निशाने पर बिहार का स्वास्थ्य विभाग रहा है। कोरोना काल में पीड़ितों को हॉस्पिटल में इलाज कराने के लिए बेड नहीं मिला। ऑक्सीजन की भारी किल्लत झेलनी पड़ी, जान बचाने के लिए लोगों को ब्लैक में ऑक्सीजन खरीदने पड़े। रेमडेसिवीर इंजेक्शन की कालाबाजारी जमकर हुई। हर स्तर पर कोरोना पीड़ितों और उनके परिवार को फजीहत झेलनी पड़ी। यहां तक की लाशों को जलाने के लिए श्मशान घाट पर भी घंटों इंतजार करना पड़ा। परेशानियों से भरी काफी सारी तस्वीरें सामने आ चुकी हैं। कई पत्रकार और डॉक्टरों तक की मौत हो गई। इन्हीं बातों के आधार पर पूर्व DGP ने बिहार सरकार की व्यवस्था पर सवाल दाग दिया है।

उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा है कि ''कोरोना का दौर अति करुणामयी होता जा रहा है। निरीह की भांति कभी समाज की विवशता को देखता हूँ तो कभी सरकारी प्रतिक्रिया को।

सरकार में मुख्यतः तीन स्तर होते हैं। सबसे ऊपर हैं मंत्रीगण जिन्हें नियम-कानून की बारीकियों को समझाने के लिए IAS पदाधिकारीगण होते हैं, जो "ब्यूरोक्रेसी" का अंग भी होते हैं। यह दोनों मिलकर नीति निर्धारण करते हैं। पश्चात इसके, नीति को क्रियान्वित करने के लिए उस विभाग के निदेशालय को कार्य दिया जाता है। निदेशालय में उस विभाग के तकनीकी जानकार होते हैं जो नीति और तकनीक का समन्वय कर, जनता के हित में कार्यवाई करते हैं।

सरकार के सभी विभागों का कार्य इसी प्रक्रिया से किए जाने का प्रावधान है। समय के साथ, पुलिस को छोड़ कर, सभी निदेशालय ध्वस्त हो चुके हैं। पुलिस का निदेशालय खाका स्वरुप ही सही, इसलिए बचा हुआ है क्योंकि इसकी संरचना एक कानून के तहत की गई है जिसे सरकारी आदेश से निरस्त नहीं किया जा सकता है अन्यथा इस निदेशालय का ढाँचा भी ढूंढने से नहीं मिलता।

यही कारण है कि कोरोना की इस त्रासदी में जब जनता अथवा मीडिया दुखित होकर सवाल पूछती है, तो जवाब देने के लिए मंत्री आते हैं या हॉस्पिटल के डॉक्टर। स्वास्थ्य निदेशालय जो क्रियान्वयन की ज़िम्मेदारी लेता है, वह विलुप्त हो चुका है। अतः अदृश्य रहता है। प्रश्न पास होकर सीधे अस्पताल प्रबंधन के पास आ जाता है।

बहरहाल सरकार का जो भी स्तर नीतिगत निर्णय ले कर क्रियान्वयन कर रहा है, उसे समाज और मीडिया के सामने सवालों के उत्तर देने के लिए आना चाहिए।''

निश्चित तौर पर अभ्यनांद के सवाल ने सरकार और उसके अंगों को हिला कर रख दिया है। राज्य के मुख्यमंत्री अभयानंद के द्वारा दिए लिखे गए इस वक्तव्य से परेशान है, जबकि उनके पार्टी के प्रवक्ता को कुछ बोलने की हिम्मत नहीं हो रही है। लेकिन सवाल है तो जवाब देना हीं होगा। देखना बड़ा दिलचस्प होगा कि आखिर अभयाण्द के इन सवालों का जवाब सरकार किस स्तर से देती है। जहां तक मैं समझ पा रहा हूं कि इसका जवाब शायद हीं मुख्यमंत्री के पास भी हों। 

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